एक राजनैतिक विरासत  का जाना

शमशेर सिंह बिष्ट

कुमाऊँ  के प्रशिद्ध स्वतंत्रता सेनानी  हरगोविन्द पंत के दो पुत्रों व चार बहिनों में से ही एक सुश्री रमा पंत थीं, जो सन् 1974 से 1977 तक अल्मोड़ा विधानसभा क्षेत्र से विधायिका रहीं। 18 अप्रैल 2013 को 79 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। अपने पिता की राजनैतिक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए वे आजन्म अविवाहित रहीं। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा एडम्स व जी.जी.आई.सी अल्मोड़ा से हुई तथा लखनऊ से उन्होंने राजनैतिक शास्त्र से एम.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। हिन्दी, अंग्रेजी व उर्दू बोलने व सिखने में उनका अच्छा ज्ञान था। राजनीति के अलावा वे विभिन्न महिला व सामाजिक संगठनों से जुड़ी रहीं। अपनी अन्तिम अवस्था में भी वे सामाजिक कार्यों में सक्रिय बनी रहीं। यह सच है कि अपनी स्पष्टता व स्वच्छ छवि के कारण वे आगे नहीं बढ़ पायीं। कांग्रेस में के.सी. पंत के करीबी होने के कारण, दूसरे गुट ने उनके लिये हमेशा बाधा खड़ी की तथा आगे बढ़ने के अवसर उपलब्ध नहीं कराये। इसलिये दुबारा कांग्रेस ने उनको अपना उम्मीदवार नहीं बनाया।

सन् 1974 से 77 का काल देश व उत्तराखण्ड के लिये जन-आन्दोलन का समय था। इस समय कुमाऊँ  विश्वविद्यालय का आन्दोलन भी अपने चरम सीमा में था तथा अल्मोड़ा में पानी के लिए जबरदस्त आन्दोलन चल रहा था। ऐसे समय में रमा पंत ने आन्दोलनों के बीच रहकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। केन्द्र सरकार में के.सी. पंत महत्वपूर्ण भूमिका में थे, लेकिन इसका लाभ रमा पंत ने अपने व्यक्तिगत लाभ के लिये नहीं बल्कि जनता के लाभ के लिये उठाया। जनता के बीच रहकर उन्होंने अपने जनप्रतिनिधि होने की महत्तवपूर्ण भूमिका निभाई। सरकार व आन्दोलनकारियों के बीच पुल का कार्य किया, इसीलिये पहली बार अल्मोड़ा में करोड़ों की पेयजल योजना आई तथा कुमाँऊ  विश्वविद्यालय की भी स्थापना हुई। आपातकाल लागू होने से जो आक्रोश देश भर में फैला था, उसका खामियाजाा रमा पंत को भुगतना पड़ा। लेकिन रमा पंत ने कभी भी व्यक्तिगत स्तर पर कोई बदला लेने की भावना नहीं दिखाई। अपने विरोधियों को भी उन्होंने सम्मान दिया। भाजपा के वरिष्ठ नेता शोबन सिंह जीना का वे हमेशा सम्मान करती रहीं। शराब विरोधी व उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन में भी वे सक्रिय रहीं। उर्दू की गजल में वे अपनी अभिव्यक्ति दमदार ढंग से करती थीं।

लेकिन अल्मोड़ा की इस जुझारुमहिला के निधन पर 20 अप्रैल को नगरपालिका भवन में श्रद्धांजलि सभा रखी गयी तो वहाँ सिर्फ 8 लोग उपस्थित थे। जबकि इन्होंने अपने कार्यकाल में सैंकड़ों लोगों का भला किया था। जिस दल से वे जिन्दगी भर जुड़ी रहीं तथा दल की सेवा के लिए अविवाहित तक रहीं, उस दल से सिर्फ एक बुजुर्ग शंकरदत्त पाण्डे उपस्थित थे। शहर के बीच में नगरपालिका है, वोट माँगने के लिये माइक लगाकर नेता दौड़ रहे थे। परन्तु किसी को अपनी पूर्व विधायिका को श्रद्घांजली देने की फुरसत नहीं थी। राजनैतिक दलों का चरित्र आज कितना व्यक्तिवादी हो गया है, यह इससे स्पष्ट हो जाता है। लेकिन रमा पंत का जाना एक राजनैतिक विरासत का भी जाना है।
loss of a political legacy

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