निराशा से उपजी आत्महत्या  

 चन्द्रकला

वर्षों बाद पहाड़ के किसी गाँव की  शादी में जाने का अवसर मिला। गाँव की परम्परा में बाजारू आधुनिकता का अजब-सा मिश्रण दिखा। सीरियलों और फिल्मों का असर न केवल महिलाओं, लड़के-लड़कियों के पहनावे व भाव-भंगिमाओं में झलक रहा था बल्कि कई प्रकार की रस्म अदायगी भी ऐसी दिखी जो आमतौर पर कुमाउँनी शादियों में नहीं देखी जाती। गीत, शगुन आँखर, ढोलक की थाप नाम भर के लिए ही इस्तेमाल हुए। डेक पर बजते आधुनिक भड़काऊ  गीत-संगीत का शोर सब पर हावी था।

गणेश पूजा, सुंवालपथाई व शादी के अन्य तमाम विधि-विधान, वर-वधू के परिवार वालों, रिश्तेदारों को कब क्या करना है? कैसे करना है? कहाँ खड़े होना है? कहाँ बैठना है, यहाँ तक कि पंडित को भी अधिकतर दिशा-निर्देश देने का काम वीडियोग्राफर व फोटो खींचने वाले करने लगे हैं। शादी-ब्याह में जहाँ पहले आस-पास के सभी गाँवों की विभिन्न बिरादरियों को आमंत्रित किया जाता था, वह अब अपने गाँव तक ही सीमित दिखी। गाँव के कुछ लोग बच्चे व शहरों से आये कुछ नाते-रिश्तेदारों की ही भागीदारी थी। एक बड़ा चबूतरा भी पूरा भरा नहीं था।

सुबह गाँव से 11 बजे करीब बारात निकली। गाँव के निचले हिस्से में नई बनी सड़क पर खड़ी गाड़ियों तक दूल्हे को डोली में बिठाकर पहुँचाया गया। वापसी में इसी डोली में दुल्हन को लाया जायेगा। लड़कियों व महिलाओं ने बारात में जाने के लिए गाड़ियों में पहले ही जगह बना ली थी। बारात निकल जाने के बाद पीछे रह गईं परिवार की महिलाओं ने रत्याली (महिलाओं का नृत्य-संगीत, स्वांग आदि) शुरू कर दी। धीरे-धीरे गाँव की अन्य महिलाएँ भी अपने घरेलू काम निपटाकर इसमें शामिल होती जातीं। मैं कुछ देर तक इस समूह में शामिल रही लेकिन ज्यादा देर वहाँ बैठने से बेहतर गाँव में लोगों से मिलना-जुलना व गाँव के घरों की स्थिति को देखना लगा। वैसे भी लम्बे समय बाद गाँव आओ तो ताले लगे या खंडहर होते पुराने घरों की संख्या बढ़ जाती है और लोगों की संख्या कम होती जाती है।

शाम होते-होते बारात वापस पहुँच गई। दुल्हन को डोली से चबूतरे में उतारा गया और दोनों (दुल्हा-दुल्हन) का महिलाओं ने स्वागत किया। सारी रस्में पूरी की गयीं। अब पिता के घर से आयी लड़की पति के घर की बहू बन गयी थी। कुछ जिम्मेदार पुरुषों ने बाहर रसोई सम्भाल ली थी। युवा डेक की तीखी धुनों पर नाच रहे थे तो कुछ शराब के नशे में धुत अपने को सम्भाल नहीं पा रहे थे।

बारात से वापस आयी समूह में बैठी महिलाओं की भाव-भंगिमाएँ और धीरे बोलने के प्रयास में भी ऊँची होती आवाजों की ओर जब ध्यान गया तो पता चला कि अल्मोड़ा जिले के हवालबाग ब्लॉक के क्वीरला गाँव में जहाँ बारात गयी थी, शादी वाले घर के पड़ोस में 23 वर्षीया एक बहू ने गले में साड़ी लपेटकर फाँसी लगा ली और तत्काल उसकी मौत हो गई। इस दौरान बहू के तीन वर्षीय पुत्र को लेकर उसके सास-ससुर शादी में मौजूद थे। बहू भी कुछ समय तक शादी वाले घर में आयी थी। घर जाकर उसने आत्महत्या कर ली। बहू का पति रानीखेत में ड्राइवरी करता था। वह भी घर पर मौजूद नहीं था।
suicide due to despair

महिलाएँ आपस में मरने वाली बहू के बारे में लगातार बातचीत कर रही थीं। कुछ का मानना था कि सास से झगड़ा रहता था। कुछ का कहना था कि वह अच्छे घर की पढ़ी-लिखी लड़की थी, पति के साथ रानीखेत जाना चाहती थी लेकिन पति लेकर नहीं जा रहा था। सभी अपने तरीके से मौत के कारणों पर गाँव में सुनी गई बातों को व्यक्त कर रहे थे। मेरी निगाह महिलाओं से घिरी कोने में बैठी नई दुल्हन के चेहरे में गड़ गई। उसके गुमसुम, मासूम चेहरे को देखकर मन भीतर तक सिहर उठा। मरने वाली बहू उसके रिश्ते की भाभी थी। मैं सोचने लगी कि इतनी प्यारी-भोली सी यह लड़की कितने सपने लेकर ससुराल आयी है। इसका पति भी दिल्ली में नौकरी करता है। सास के साथ ही रहना होगा, यह भी अपने ससुराल में सामंजस्य नहीं बिठा पाई तो़… मैं कमरे से बाहर निकल आयी, अजीब सा तूफान उठने लगा मन में। आत्महत्या करने वाली 23 वर्षीया बहू को मैंने देखा नहीं था लेकिन उसकी छवि मेरी आँखों में उभरने लगी। क्यों किया होगा उस बहू ने मरने का फैसला? क्या केवल सास के झगड़े के कारण ही उसने अपनी जिन्दगी खत्म कर ली होगी? क्या उसे अपने तीन साल के बच्चे की ममता ने नहीं रोका होगा? फिर मन विचलित हुआ और विचार आया कि जब चारों ओर से निराश हो गयी होगी वह, कोई रास्ता नहीं सूझा होगा तब ममता, प्यार सब बेमानी हो गये होंगे। शादी का अवसर ही शायद उसको उपयुक्त लगा हो मौत को गले लगाने के लिए या शादी के माहौल को देखकर उसकी निराशा चरम पर पहुँच गई हो या उसको याद आया हो वह वक्त जब माता-पिता ने यह कहकर मायके से विदा किया होगा कि पति का घर ही अब तुम्हारा घर है, चाहे वहाँ सुख मिले या दु:ख। यानी जो भी होगा वहीं झेलना, हमने तो तेरा दान कर दिया। इस घर से अब तुम्हारा अधिकार खत्म हो गया।

सबसे दुखद बात यह थी कि वह अपने माता-पिता की इकलौती बेटी थी और ससुराल में भी अकेली बहू। बारात विदा नहीं हुई थी कि गाँव में पटवारी-पुलिस आ गयी थी।

अगली सुबह मैं जब उठकर बाहर देहरी पर पहुँची तो कल आयी नयी बहू एक सुघड़ गृहिणी की तरह घर में मौजूद महिलाओं को केतली लेकर चाय देती दिखी। मुश्किल से अठारह साल की भी नहीं रही होगी वह। मैं इतनी हिम्मत ही नहीं कर पाई कि कुछ बात कर पाऊँ उस नई लेकिन पुरानी सी दिखती बहू से़….।

दोपहर तक गाँव में अखबार पहुँच गया। अमर उजाला के भीतर पृष्ठ की बड़ी खबर थी कि 23 वर्षीय बहू ने फाँसी लगाकर आत्महत्या कर ली। लड़की के परिवार वालों ने आरोप लगाया कि ससुराल में उसको दहेज के लिए प्रताड़ित किया जाता था। पुलिस ने सास-ससुर व पति के विरुद्घ भारतीय दंड संहिता की धारा 498 व 302 के तहत मुकदमा दर्ज कर तीनों को जेल भेज दिया। मृतका के अन्तिम संस्कार के लिए भी परिवार का कोई व्यक्ति पीछे नहीं बचा होगा। माँ-पिता, दादा-दादी को खोजता बच्चा कहाँ गया होगा, शायद ननिहाल। कई लोगों के मुँह से सुना कि लड़की वालों ने पटवारी के कहने पर ही दहेज का मुकदमा ससुराल वालों पर लगवाया।

मुझे यह तो भान था कि पुलिस केस बनने का मतलब है कि सास-ससुर का जेल जाना। लेकिन रानीखेत से तत्काल पहुँचे पति को भी 302 के तहत जेल डाल दिया जायेगा, यह नहीं सोचा था। खैर, अपराध तो उनका बनता ही है। कुछ तो उनके व्यवहार में ऐसा रहा ही होगा जिससे कि बहू उनके साथ न रहकर पति के साथ जाना चाहती थी। पति यदि अपनी पत्नी की मन: स्थिति को समझ पाता। अपनी आमदनी को बढ़ाने का प्रयास कर उसको साथ ले जा पाता या कुछ समय बाद ले जाने के लिए आश्वस्त कर पाता या फिर माता-पिता ने लड़की के अनुरूप ससुराल में विवाह किया होता तो हो सकता है, वह मौत को गले न लगाती।

किसी भी बहू के फाँसी लगाने, जलने, जहर खाने या अन्य प्रकार से मौत को गले लगाने की न यह पहली घटना थी और न अन्तिम। इस तरह की घटनाओं में कुछ सालों बढ़ोत्तरी हो रही है। पहाड़ों में पहले दहेज की माँग करना मायने ही नहीं रखता था, जो संभव था लिया-दिया जाता था। बहुएँ पहले भी पहाड़ की कठिनाइयों के कारण या पति के वियोग में आत्महत्याएँ करती थीं लेकिन मायके वाले नियति मानकर चुप हो जाते थे। आज दहेज हत्या का केस लगाकर ससुराल वालों को कुछ महीने या साल जेल में रहने का सबक तो सिखा दिया जा रहा है लेकिन जो बहू-लड़की मर गई, उसके कारणों से सबक कोई नहीं लेना चाहता।

अमूमन देखने में आता है कि दहेज का केस लगाने के बाद दोनों पक्ष कोर्ट-कचहरी, वकील की फीस इत्यादि कारणों एवं सामाजिक दबाव से तंग आने के बाद आपसी समझौता करना उचित समझते हैं। आपसी लेन-देन में यदि सुलह हो जाती है तो ठीक, नहीं तो कुछ सालों बाद मुकदमा खत्म ही हो जाता है। लम्बी कानूनी प्रक्रिया में सजा कुछ ही लोगों को हो पाती है। इस सब के बीच कुछ समय बाद नई बहू लाने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। मरने वाली लड़की व बहू का अस्तित्व खत्म हो चुका होता है।

यदि गहराई से इस तरह की घटनाओं की पड़ताल की जाय तो समझ में आता है कि सदैव दहेज हत्या का मामला ही मुख्य नहीं होता। अधिकांशत: होता यह है कि लड़कियाँ जिस पारिवारिक, सामाजिक परिवेश से आती हैं, वह माहौल उनको ससुराल में नहीं मिल पाता। यदि बहू स्वयं को ससुराल के परिवेश के अनुकूल ढालने में सफल हो जाती है तो जिन्दगी जैसी भी सही, चल पड़ती है। यदि अत्यधिक विपरीत माहौल हो तो जीवन कठिन हो जाता है। शुरूआती समय में ही कई बार इस तरह की घटनाएँ हो जाती हैं, कईं बार कुछ सालों बाद। परिवार की आर्थिक तंगी, बहू के प्रति परिवार वालों अथवा पति का संकीर्ण नजरिया, बहू पर अत्यधिक नियंत्रण  रखना, उसको मात्र परिवार या पति की सेविका (नौकरानी) समझना, बहू की रुचि, योग्यता व मन:स्थिति को न समझ पाना इत्यादि कारणों से बहुओं का जीवन ससुराल में नारकीय हो जाता है। पति-पत्नी में आपसी सामंजस्य न बन पाना, पति का शराबी व बेरोजगार होना, असहयोगी व शक्की होना, परिवार की जरूरतों को पूरा न कर पाना इत्यादि भी अक्सर बहू की आत्महत्या के कारण बन जाते हैं।

आज पढ़ी-लिखी बहुएँ गाँव में रहने के बजाय शहर में पति के साथ रहकर स्वयं भी कुछ करना चाहती हैं। अक्सर ही हम पाते हैं कि माता-पिता लड़की की स्थिति, इच्छा व योग्यता को ध्यान में रखे बिना अपने सर का बोझ उतारने की खातिर कहीं भी लड़की को ब्याह देते हैं। घर-जमीन, नौकरी ही लड़की के ब्याह के समय देखा जाता है। तेजी से बदलते समाज में आज लड़कियों को अपने अस्तित्व का एहसास होने लगा है। जब उनके अनुकूल वातावरण नहीं मिलता तो निश्चित ही इस तरह की घटनाओं में बढ़ोत्तरी होना स्वाभाविक है। एक ओर तो लड़कियों व बहुओं से पुरातन पितृसत्तात्मक मूल्य व मान्यताओं के दायरों को मानने की माँग की जाती है और दूसरी ओर आधुनिक कसौटियों पर भी उन्हें तोला जाता है।

वास्तव में जब तक हमारे परिवारों व सामाजिक मूल्यों में लड़कियों को स्वतंत्र इंसान न मानकर दान की वस्तु, पराया धन, पुरुष की सेविका, लड़कों से कमतर, पुरुष के अधीन रहने वाली माना जायेगा तब तक इस तरह की घटनाओं को रोकना सम्भव नहीं, चाहे वह दहेज के लिए की गयी हत्या हो या बहू की निराशा से उपजी आत्महत्या।
suicide due to despair
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