गाय रो रही है : संस्कृति
दिवा भट्ट एक गाय रो रही है,रह-रह कर बिसूर रही है,रस्ते-रस्ते डोल रही है,इधर-उधर दौड़ रही है,खेत-खलिहान फाँद...
दिवा भट्ट एक गाय रो रही है,रह-रह कर बिसूर रही है,रस्ते-रस्ते डोल रही है,इधर-उधर दौड़ रही है,खेत-खलिहान फाँद...
अर्चना रावत हम महिलाएँ अपने नाम के पीछे देवी लगाती आई हैं पर समाज ने हमें कभी अपनी...
चन्द्रप्रभा ऐतवाल गतांक से आगे कहाँ मेरा 13 सितम्बर को अन्तिम समय आ गया था। डॉक्टर पुनेकर की...
योजक चिह्न दिव्या सुना है मैंनेघास के लिएजंगल जातीऔरतों कोकिस्सोंकहानियों मेंलेकिनदेखती आ रही हूँअपनी माँ कोकई बरसों सेनौकरी...
सुहैल वहीद कलावती को खुशी है कि वह गरीबों के लिए साझा शौचालय बनाने और महिलाओं के सम्मान...
प्रदीप पाण्डे कोई 35-40 साल पहले एक गीत चला था ‘गोरे रंग पे न इतना गुमान कर गोरा...
रश्मि बड़थ्वाल यशी बेटा, वह घर तुम्हारे योग्य नहीं है। मैं एक हफ्ते से लगातार उन लोगों के...
राजाराम विद्यार्थी शाम का वक्त, सूरज ढल चुका है। गाय-भैंसों को बाहर से अन्दर गोठ में बाँध दिया...
आजादी की लड़ाई के दौरान जन्मी और आजादी के बाद समाज के निर्माण में सक्रिय रहीं, सरला बहन...
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