उत्तरा जुलाई-सितम्बर 2015

गाय रो रही है : संस्कृति

दिवा भट्ट एक गाय रो रही है,रह-रह कर बिसूर रही है,रस्ते-रस्ते डोल रही है,इधर-उधर दौड़ रही है,खेत-खलिहान फाँद...

कविताएँ

योजक चिह्न दिव्या सुना है मैंनेघास के लिएजंगल जातीऔरतों कोकिस्सोंकहानियों मेंलेकिनदेखती आ रही हूँअपनी माँ कोकई बरसों सेनौकरी...

कलावती का शौचालय मिशन

सुहैल वहीद कलावती को खुशी है कि वह गरीबों के लिए साझा शौचालय बनाने और महिलाओं के सम्मान...

कुँए में कूद-कहानी

रश्मि बड़थ्वाल यशी बेटा, वह घर तुम्हारे योग्य नहीं है। मैं एक हफ्ते से लगातार उन लोगों के...

कहानी : वजूद  

राजाराम विद्यार्थी शाम का वक्त, सूरज ढल चुका है। गाय-भैंसों को बाहर से अन्दर गोठ में बाँध दिया...