गिर्दा को आखिरी सलाम

कमला पंत

मुझे ठीक से याद नहीं, उस समय रात के कितने बज रहे थे। मैंने भारत में पद्मा गुप्ता को पफोन लगाया था। उन्होंने मुझे गिर्दा के निध्न के बारे में जैसे सूचना दी, मैं स्तब्ध् रह गयी। मुझे कुछ भी नहीं सूझ रहा था। मैंने उसी समय नैनीताल राजीव दा को फोन किया। उन्होंने बताया कि वे सभी गिर्दा के वहाँ हैं व अन्तिम यात्रा की तैयारी हो चुकी है। इस समय यहाँ सुबह के 11 बज रहे हैं। उनकी आवाज में गहरी उदासी व भारीपन था। उन्होंने कहा, भाभी से बात कर लो लेकिन न तो मैं कुछ कह पाने की स्थिति में थी और ना ही उनकी ओर से कोई आवाज आयी। यह मौन बहुत कुछ कह रहा था लेकिन…..।

उस रात में बिलकुल नहीं सो पायी। एक-एक करके आँखों के सामने वे सारे क्षण, वे यादें तैरने लगीं जो हमने गिर्दा के साथ बिताए थे। कानों में उनके गाये वे गीत गूँजने लगे जो हमें हमेशा झकझोरते रहे और लड़ने की ताकत देते रहे। इतने चित्रा, इतनी यादें और गिर्दा के न रहने का एहसास। ऐसे समय में भारत से इतनी दूर यहाँ होने, सबके बीच न हो पाने और गिर्दा से अब कभी भी मुलाकात न हो पायेगी, इस बात के दर्द और एहसास को मैं बयान नहीं कर सकती हूँ, कभी नहीं। बस अब यादें ही हैं और कानों में उनके गाये गीतों की गूँज। आज हिमाल तुमन कैं धत्यूँछ….., हमारी ख्वाहिशों का एक नाम इंकलाब है…, कौन आजाद हुआ किसके माथे से गुलामी की सियाही छूटी…., लस्कै कमर बाँध हिम्मत का साथ न जाने कितने जन गीत हमने उन्हीं से सीखे और हमेशा गाए।

नशा नहीं रोजगार दो आन्दोलन के उस दौर में 17 जून की तैयारी करते हुए हम लोग जन सम्पर्क अभियान पर थे। सुबह-सुबह उठकर हम सभी पद यात्रा पर चल दिये थे। चलने के थोड़ी देर बाद ही भूख लग गयी। तभी गिर्दा ने अपने पास बाँधी बासी रोटियों (गिर्दा के कमरे के सदाबहार मेहनतकश साथी राजा के हाथों की बनी) की पोटली निकाली;  साथ ही नमक व लहसुन की पफलियाँ। सबने मिलकर वह रोटियाँ नमक व लहसुन के साथ खायीं, उसका वह स्वाद, वह आनन्द और वह सब हमें देकर गिर्दा के मुख पर छायी खुशी का वह एहसास, कभी भुलाया नहीं जा सकेगा।
(Last Salute to Girda)

एक बार हम लोग अल्मोड़ा साथ जा रहे थे मैं, बसी, उमा भाभी। गिर्दा भी हमारे साथ थे। रास्तेभर उन्होंने हमारी ख्वाहिशों का एक नाम इंकलाब है। जिस जुनून व आत्मीयता के साथ गाया कि हम कल्पनाओं में खोकर कब अल्मोड़ा पहुँचे, पता ही नहीं चला। शराब आन्दोलन के दौरान नैनीताल कोर्ट में जब मैं, निर्मल, सावित्री आमरण अनशन में बैठे थे तो गिर्दा नियमित रूप से हमारे पास आकर बैठ जाते। देर रात तक वे हमारे साथ ही बैठे रहते। उन्हें हमारे स्वास्थ्य की बड़ी चिन्ता रहती थी लेकिन हमारा साहस भी बढ़ाते रहते थे। वे अपने साथ नींबू लाना नहीं भूलते थे।

गिर्दा से मेरी पहली मुलाकात का एहसास भी मेरे लिए बड़ा अचम्भित करने वाला था। मैंने तब अल्मोड़ा में कानून की पढ़ाई शुरू की थी। निर्मल व पुष्पा जोशी मेरे सहपाठी थे। पहले पहल मैंने इनसे ही गिर्दा के बारे में सुना था। ये लोग हमेशा गिर्दा की बातें करते थे कि कैसे प्रतिभावान समर्पित व्यक्ति हैं, एक उच्च वर्गीय परिवार से होकर भी जात-पात, ऊँच-नीच की भावनाओं से पूरी तरह ऊपर उठकर कैसे उन्होंने अपना पूरा जीवन समाज के लिए लगा दिया है। घर-बार तक छोड़ दिया है। मैं तब बी.ए. करने के बाद कानून की पढ़ाई शुरू ही कर रही थी। मुझ में तब बचपना ही था। मैंने इस अद्भुत महान व्यक्तित्व को लेकर न जाने क्या-क्या कल्पनाएँ की थीं। एक बार मिलकर देखने जानने की इच्छा भी थी। वह दिन भी आया। मल्लीताल की चढ़ाई पार करके हम पुराने सचिवालय भवन (अब हाईकोर्ट) की तरफ बढ़ रहे थे कि निर्मल ने कहा कि अब हम पहुँचने ही वाले हैं। कुछ ही देर में हम सड़क से हटकर लगी चाय की छोटी-सी दुकान के सामने खड़े हुए कि उसने कहा कि लो आ गए। मेरी कुछ भी समझ में न आया। मैंने उससे पूछा कि गिर्दा का घर कहाँ है। उसने चाय की दुकान की बगल से अंदर को जाती हुई अंधेरी गली की ओर इशारा किया और कहा इसी के अन्दर। अन्दर जाकर जो देखा वह मेरी जैसी लड़की के लिए तब सच में चैंकाने वाला था। सब कुछ अस्त व्यस्त, मैला-कुचैला। दो चारपाइयों पर फैले बिस्तर, जमीन पर एक किनारे पड़े कुछ बर्तन इधर-उधर फैले व खूँटी में टंगे कपड़े, कमरा भी क्या बस एक कोठरी। वहाँ उनका रूमपार्टनर राजा और सुन्दर प्यारा-सा लड़का पिरम। यही था गिर्दा का घर-परिवार। मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि यही गिर्दा का घर है। जहाँ आज हमने रुकना है व खाना भी खाना है। कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि तभी बाहर चाय की दुकान से चाय व पकौड़ियाँ आ गईं। गिर्दा बहुत बड़े विद्वान हैं, राजनीति, कला-संस्कृति के मनीषी हैं और सदा आमजन के जीवन को बेहतर बनाने के लिए सोचते हैं व काम करते हैं। यह सब तो सुना था, पर वह ऐसे रहते हैं यह मेरे लिए कैसे विश्वसनीय होता। गिर्दा काफी देर से आये, आते ही परिचय के साथ ही पहले वह सब्जी काटने लग गये तथा राजा रोटी बनाने की तैयारी में। कुछ बातें गिर्दा की कभी भुलाये नहीं भूल सकती। सब्जी को जिस करीने से वह साफ-सफाई के साथ काटते थे उसे देखना हमेशा ही एक अद्भुत आनन्ददायी एहसास होता। पूरी साफ-सफाई के साथ राजा के हाथों की बनी कोयले की आँच में सिकी मोटी, करारी रोटियाँ और गिर्दा के हाथों से बनी सब्जियों का स्वाद मैं ही क्या, हम सभी जो उनके करीब थे, शायद ही कभी भूल पाये हैं।
(Last Salute to Girda)

उनके कमरे में जितनी अस्त-व्यस्तता व लापरवाही थी उतनी ही नपफासत उनके द्वारा किये जाने वाले कामों में थी। सब्जियाँ काटने का काम हो या पिफर कोई अन्य काम उनकी गायकी, उनकी रचनाएँ, उनकी सोच, उनकी सम्भाषण कला या उनकी राय सभी कुछ सदा ही बेहद व्यवस्थित व परिपक्व थी।

असल में उनकी जीवन शैली के प्रति उनका अपना जीवन दर्शन था। यह बाद में हम धीरे-धीरे समझने लगे थे। वह अपनी सोच के साथ कभी भी बेईमान नहीं हो सकते थे। मन, वचन व कर्म हर तरह से ईमानदार रहने की उनकी कोशिश थी। मुझे आज भी ताजुब होता है कि उन्होंने ‘नशा नहीं रोजगार दो’ आन्दोलन के दौर में आन्दोलन में भागीदारी के साथ ही शराब से स्वयं भी दूरी बनाये रखने की पुरजोर व बहुत हद तक सपफल कोशिश की, यह उनकी ईमानदारी ही थी। उनकी विद्वत्ता अद्वितीय थी। हमेशा आमजन, दबे कुचले मेहनतकश लोगों के साथ एकरस बने रहने की एक बेताबी-सी उनमें रहती थी। हर एक के लिए जो भी बेहतर समाज के निर्माण के प्रति विचारशील हों, कर्मशील हों, उनके मन में गहरा स्नेह भाव कूट-कूटकर भरा रहता था।

संघर्षवाहिनी के जनसंघर्षों का दौर रहा हो या उत्तरा महिला पत्रिका निकालने, उसे आगे बढ़ाने की बात हो, राज्य आन्दोलन या उत्तराखण्ड महिला मंच द्वारा समय-समय पर उठाये गये विविध् जनान्दोलनों की बात हो, जब भी उनकी सलाह की जरूरत हुई, उनसे सहयोग की जरूरत हुई तो उन्होंने इस बात का एहसास करते ही स्वयं ही आगे बढ़कर हमें मार्गदर्शन भी दिया और हर अपेक्षित सहयोग भी। गिर्दा को याद करते हुए मुझे आज बहुत से अन्य साथी भी बेहद याद आ रहे हैं विशेषकर निर्मल जोशी जिसने सबसे पहले मेरा उनसे परिचय कराया। उनके उस कमरे का चिर साथी राजा। उसी दौर के हमारे साथी खड़क दा (खड़क सिंह  खनी)। आज ये तीनों भी हमारे बीच नहीं रह गये हैं।

गिर्दा को याद करते हुए मुझे हर आन्दोलन में उनके साथ बिताये अनगिनत क्षणों की यादों के साथ ही साथ उन जगहों की यादें भी बरबस अपनी ओर खींच रही हैं जहाँ वह अलग-अलग दौर में हमारे साथ रहे। नैनीताल में मल्लीताल रिक्शा स्टैण्ड के पास शाम के समय अपने साथियों का इंतजार करना, वहीं सामने वाली दुकान पर गिर्दा का हमें बन्द मक्खन खिलाना, डाँठ व फ्लैट पर बैठकर साथियों के साथ दिनभर की व आगामी कार्यक्रमों की चर्चा करना। बिन्दुखत्ता हो, देहरादून, गैरसैंण, नैनीताल या अल्मोड़ा। कई जगह व घटनाएँ हैं जिनसे गिर्दा की बहुत-सी यादें जुड़ी हैं जो बरबस आज जबकि वे नहीं हैं आँखें नम कर जाती हैं। गिर्दा चले तो गये हैं पर उत्तराखण्ड के आन्दोलनों के इतिहास से जुड़े हर व्यक्ति के दिल में वह हमेशा-हमेशा अमर रहेंगे। गिर्दा, नम आँखों के साथ यह आपको मेरा आखिरी सलाम है पर आप जीवन पर्यन्त मेरे लिए प्रेरणा स्रोत रहे हो और हमेशा बने ही रहोगे।
(Last Salute to Girda)

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