नरेंद्र दाभोलकर: धर्मान्धता के विरुद्ध लड़ने की सजा

ब्रजेश जोशी

निसार मैं तेरी गलियों पे ए वतन के जहाँ
चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले।

वर्तमान समय में भारतवर्ष में यह प्रवृत्ति दिनोंदिन बढ़ती जा रही है कि आम लोगों की भलाई के लिए जो कृतसंकल्प होकर जुट जाता है, उसे समाज के दुश्मन और निहित स्वार्थ सिद्ध करने वाले लोग रास्ते से हटा देते हैं। 20 अगस्त को पूना में डॉ. नरेन्द्र दाभोलकर की सरेआम गोली मारकर हत्या कर दी गई। सब देखते रह गये। कुछ नहीं हुआ। यह हत्या सिर्फ नरेन्द्र दाभोलकर की हत्या नहीं, बल्कि उन तमाम लोगों की हत्या है जो समाज विरोधी प्रवृत्तियों का सख्ती से प्रतिरोध करते हैं। चाहे ये आर.टी.आई. कार्यकर्ता हों या नरेन्द्र दाभोलकर। इनकी सक्रियता और इनका आन्दोलन कहीं न कहीं कुछ निहित स्वार्थी तत्वों को नुकसान पहुँचा रहा था। उन लोगों के विरुद्ध था जो धर्म और आस्था के नाम पर आम लोगों को गुमराह करते हैं।

डॉ. दाभोलकर मृत्यु के बाद ब्रूनो जैसे वैज्ञानिकों की शहीदी परम्परा में शामिल हो गए हैं। जिन्हें सन् 1600 में इटली में इसलिए जिन्दा जला दिया गया था क्योंकि उन्होंने सूर्य को आवश्यक रूप से एक तारा माना था। ऐसा माना जाना तब की धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ था।

डॉ. नरेन्द्र अच्युत दाभोलकर का जन्म 1 नवम्बर 1945 में महाराष्ट्र के सतारा जिले में हुआ था। उनके बड़े भाई डॉ. देवदत्त दाभोलकर पुणे विश्वविद्यालय के पूर्व कुलगुरु थे। जबकि दूसरे भाई डॉ. दन्तप्रसाद दाभोलकर वरिष्ठ वैज्ञानिक व विचारक हैं। डॉ. नरेन्द्र की पत्नी शैला दाभोलकर भी सामाजिक कार्यों में उनके साथ थीं। इन दोनों ने काला जादू, जादू टोना जैसी चीजों को अंधविश्वास से परे मानसिक रूप से परे देखने की वकालत भी की। इस कार्य में उनका बेटा हमीद व बेटी मुक्ता भी उनके साथ थी।

एम.बी.बी.एस. की पढ़ाई पूरी करने के बाद डॉ.दाभोलकर डाक्टर बनने की बजाय सामाजिक कार्यों की तरफ मुड़ गये। 1982 से वे अंधविश्वास निर्मूला आन्दोलन के पूर्णकालीन कार्यकर्ता थे। सन् 1989 में उन्होंने महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूला समिति की स्थापना की। तब से वे समिति के कार्याध्यक्ष थे। यह संस्था किसी भी तरह की सरकारी या विदेशी सहायता के बिना काम करती है। इस संगठन की महाराष्ट्र में लगभग बीस शाखाएँ हैं।

अपने तीन दशक से भी अधिक के कार्यकाल में डॉ. दाभोलकर ने पोंगा पंडितों और दंभियों का दंभ फोड़ करने वाली कई पुस्तकें लिखीं किया। खासकर तथाकथित चमत्कारों के पीछे छिपी हुई वैज्ञानिक सच्चाइयों को उजागर करने पर उन्होंने अधिक ध्यान दिया।

ऐसे कैसे झाले भोंदू (ऐसे कैसे पोंगा पंडित), अंधश्रद्धा विनाशाय, अंधविश्वास प्रश्नचिन्ह और पूर्ण विराम, प्रश्न मनचाहे (सवाल मन के) आदि पुस्तकें उनमें सम्मिलित हैं।

जाने-माने साहित्यकार और समाजवादी चिन्तक साने गुरुजी द्वारा स्थापित ‘साधना’ साप्ताहिक का संपादन वे पिछले बारह वर्षों से कर रहे थे। अपनी व्यक्तिगत क्षमता के लिए मशहूर डॉ. दाभोलकर अनेक संतों के उदाहरण देकर भोंदू बाबा और नकली संतों-महंतों पर प्रहार करते थे। एक बार स्व. विजय तेंदुलकर ने उनसे पूछा था, ‘क्या तुम्हें नहीं लगता कि श्रद्धा या आस्था रखना लोगों की मजबूरी है? तब डॉ. दाभोलकर ने कहा था, मुझे मजबूरीवश आस्था रखने वालों से कोई आपत्ति नहीं है। मुझे आपत्ति है दूसरों की मजबूरियों का गलत फायदा उठाने वालों से।’

डॉ. दाभोलकर ईश्वर में आस्था रखने वाले पर ताने कसने की बजाय उस पर सहानुभूति जताते थे। वे कहते मुझे उन लोगों के बारे में कुछ कहना है जिन्हें संकट के समय ईश्वर की जरूरत होती है। लेकिन हमें ऐसे लोग नहीं चाहिए जो काम-धाम छोड़कर धर्म का महिमा मंडन करें और मनुष्य को अकर्मण्य बनाएँ।
Narendra Dabholkar: Punishment for fighting against bigotry

उन्हीं के प्रयासों के कारण 7 जुलाई 1975 को विधानसभा में जादू-टोना विरोधी कानून बनाने का प्रस्ताव पारित किया गया। लेकिन राजनीतिक स्वार्थ के खेल में उसे आज तक वास्तविकता में नहीं उतरने दिया गया। डॉ. दाभोलकर ने 18 साल पहले ‘सामाजिक कृतज्ञता निधि’की स्थापना की जिसके तहत परिवर्तनवादी आन्दोलन के कार्यकर्ताओं को प्रतिमाह मानधन दिया जाता है। आज यह निधि एक करोड़ रुपये तक पहुँच चुकी है, आज इसी रकम से कार्यकर्ताओं को वेतन दिया जाता है। डॉ. दाभोलकर ने जाति निर्मूलन के लिए अंतरजातीय व अंतरधर्मीय विवाह को प्रोत्साहन देने का काम किया। उनके मन में जाति खुद एक अंधविश्वास है। उन्होंने पूजा, धर्म या धार्मिक  उत्सवों का कभी विरोध नहीं किया, उन्होंने विरोध किया। उसमें निहित अमानवीयता और अवैज्ञानिकता का। हालांकि उनके विरोधी उन्हें खासतौर पर हिन्दू विरोधी मानते आए हैं। जहाँ भी किसी बाबा या माता का आडम्बर दिखता वे भी लोगों को समझाने पहुँच जाते। इस कार्य में डॉ. श्रीराम लागू, नीलू फूले जैसे कलाकार और विजय तेंदुलकर जैसे लेखकों का उन्हें साथ मिला था। अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के माध्यम से दाभोलकर समाज में प्रचलित कई प्रकार के अंधविश्वासों जैसे- ज्योतिष, पशुबलि, भूत-प्रेत बाधा, पुनर्जन्म, काला जादू, स्वयं को ईश्वर घोषित कर देना, महिलाओं को डायन कहना इत्यादि का विरोध उनकी वैज्ञानिक एवं तार्किक व्याख्याएँ देते हुए कर रहे थे। वे चमत्कारों और अंधविश्वासों की व्याख्याएँ किसी बंद कमरे में नहीं, बल्कि समुदाय में जाकर कर रहे थे। उनका यही प्रयास था कि समाज में वैज्ञानिक नजरिये की स्थापना की लड़ाई को और भी ताकत दिलाई जा सके। हमारे देश की नई विज्ञान व तकनीकी नीति जो इस वर्ष की शुरूआत में लागू की गई थी, उसमें भी वैज्ञानिक चेतना के विकास की आवश्यकता को महत्वपूर्ण तरीके से रेखांकित किया गया है एवम् इस हेतु हर स्तर के नवोन्मेष या नवाचार की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया है। लेकिन यह त्रासदीपूर्ण है कि हमारे देश में वैज्ञानिक चेतना के विकास के लिए उम्रभर प्रयास करते रहने को संकल्पित दाभोलकर जैसों को सरेआम गोलियों से छलनी कर दिया जाता है। विभिन्न ऐतिहासिक कारणों के चलते हमारे देश में आज भी तमाम लोगों का मन जादू-टोना, टोटका और कई तरह के अंधविश्वासों की गिरफ्त में है। इसके चलते वे लोग दैहिक, आर्थिक, मानसिक व अन्य प्रकार के शोषण के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बने हुए हैं। अपनी विशिष्ट सामाजिक स्थितियों के कारण महिलाएँ व लड़कियाँ इस प्रकार के अंधविश्वासों की गिरफ्त में आसानी से आ जाती हैं और सबसे ज्यादा शोषण का शिकार बनती हैं। उन्हें चुड़ैल, डायन, टोन्टी कहकर उन पर जुल्म व अपमान किए जाते हैं। गाँवों में मानसिक बीमारी से पीड़ित बच्चों का इलाज न करवाकर किसी तांत्रिक व ओझा के पास जाकर उनके नाम से पशुबलि (बकरी, मुर्गा, सूअर) दी जाती है जो कि अमानवीय है व बिल्कुल भी तर्कसंगत नहीं है।

डॉ. दाभोलकर की मौत ने एक साथ कई ऐसे राष्ट्रीय प्रश्न उठाये हैं जिनसे पूरा भारतीय समाज ग्रसित है। भारत के पहले प्रधानमंत्री पं. नेहरू द्वारा संविधान में वैज्ञानिक सोच के कार्यान्वयन के बावजूद मौजूदा समाज और शिक्षा व्यवस्था का ढाँचा ऐसा रहा है कि जिसमें ऐसे अंधविश्वास और अवैज्ञानिकता लगातार बढ़ती रहती है। नरेन्द्र दाभोलकर की शहादत ने भारतीय समाज में जादू-टोने से मुक्ति को एक चुनौती की तरह पेश किया, विशेषकर हिन्दी पट्टी के राज्यों को तो युद्धस्तर पर इन अंधविश्वासों के खिलाफ लड़ने की जरूरत है।

20 अगस्त को तर्कनिष्ठ और विवेकवादी आन्दोलनकर्ता डॉ. दाभोलकर की नृशंस हत्या कर दी गई। पुलिस व प्रशासन को इसकी सूचना भी थी कि कुछ हिन्दुत्ववादी संगठनों ने उन्हें गाँधी जैसा अंजाम भुगतने की धमकी दी थी लेकिन उनके खिलाफ कोई कारवाई नहीं की गई। अभी भी अनेक हत्यारे पकड़े नहीं गये हैं। विडंबना यह है कि जिस दिन हत्या हुई उस दिन संसद चल रही थी लेकिन किसी सांसद ने इस हत्या को लेकर कोई सवाल उठाना जरूरी नहीं समझा। दूसरी ओर एफ.टी.आई.आई. एवं युगपथ के छात्रों ने अंधविश्वास विरोधी योद्धा नरेन्द्र दाभोलकर को श्रद्घांजलिस्वरूप जब फिल्म ‘जय भीम कामरेड’ का प्रदर्शन किया तो उन्मादियों ने एफ.टी.आई.आई. के छात्रों पर नक्सली होने का दावा लगाकर हमला किया। वास्तविकता यह है कि वर्तमान समय में हिन्दुस्तान में सरकारों ने जगह-जगह तमाम तरह के सामंती और साम्प्रदायिक गिरोहों को खुलकर ताण्डव मचाने की छूट दे रखी है तथा शोषण, अंधविश्वास, गुण्डागर्दी के खिलाफ लड़ने वालों की सुरक्षा की फिक्र किसी को नहीं है। संसद में इन संवेदनशील मुद्दों पर कभी बहस नहीं होती। सूचना प्रौद्योगिकी के इस युग में जहाँ विकसित राष्ट्र सोशल साइट्स का इस्तेमाल अपनी राष्ट्रीय सम्पत्ति को सम्पन्न कराने के लिए कर रहे हैं, हमारे राजनेता इसका प्रयोग क्षेत्रीयता, जातियों एवं धर्म के ऑकड़ों को जुटाने के लिए कर रहे हैं। डॉ. दाभोलकर की मृत्यु पूरे भारतीय लोकतंत्र को ही खतरे में डालती है, जिन्होंने वैज्ञानिक सोच के जरिये समाज को बदलने की पहल की थी।
Narendra Dabholkar: Punishment for fighting against bigotry
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