बात मुद्दों की उठाओ तो कोई बात बने!

गिरिजा पाठक

गिर्दा, उत्तराखण्ड ही नहीं वरन् देश के भीतर जन-संस्कृति को जन तक ले जाने वाला महत्वपूर्ण व्यक्तित्व। गिर्दा को मैंने जितना जाना-समझा उन्हें अंत तक इस परिधि में खड़े पाया। मुझे याद है नशा नहीं रोजगार दो आन्दोलन, जिसके सांस्कृतिक पक्ष ही नहीं, बल्कि राजनैतिक पक्ष के भी महत्वपूर्ण दिशा-निर्देशक गिर्दा थे। किस प्रदर्शन में क्या-क्या और कैसे-कैसे होना है, अपने विचारों में किस पर चोट करनी है और किसे आगे बढ़ाना है, अगर किसी गाँव-कस्बे में आन्दोलन की आंच पहुँच चुकी है और वहाँ के लोग भी उसके साथ एकजुट हो रहे हैं तो वहाँ की विशिष्ट स्थितियों के साथ कैसे उन्हें इस आंदोलन का साथी बनाना है, बैनर क्या होगा, नारे क्या होंगे, क्या गीत रचे और गाए जायेंगे, इस सब पर खूब मंथन और बात-बहस के बीच उनकी लम्बी चुप्पी और फिर अचानक एक सुझाव उन्हें बहस के केन्द्र में ले आता था। आन्दोलन के लिए नए नारों और गीतों की रचना के लिए गिर्दा की घंटों की मेहनत उनका एक ऐसा सांस्कृतिक व्यक्तित्व सामने लाती थी जिन्होंने सही अर्थों में संस्कृति को जन संस्कृति बनाया।

किसी भी अन्य आन्दोलन की तरह इस आन्दोलन में भी अनेक उतार-चढ़ाव आए। उत्तराखण्ड संघर्ष वाहिनी उत्तराखण्ड के एक महत्वपूर्ण एवं मजबूत संगठन के रूप में उभरा और विभिन्न कारणों से इसमें बिखराव भी आया। बिखरी हुई शक्तियाँ अपने-अपने काम में जुटी रहीं। सभी में एक बात समान थी-जनपक्ष और गिर्दा इस जनपक्ष के निर्विवाद सांस्कृतिक स्वर बने रहे। उनकी रचनाएं और गीत हर धारा को ऊर्जा और प्रेरणा देते रहे और अब जब वह सशरीर हमसे विदा हो चुके हैं तो अपनी रचनाओं के रूप में गिर्दा हमेशा जिन्दा रहेंगे।
(Tribute to Girda)

गिर्दा हमारे लिए सिर्फ ऐसे व्यक्तित्व नहीं थे जो संगीत की अच्छी समझ के साथ अच्छा गीत रच सकते थे या फिर यहाँ की माटी की सौंधी महक को मंच पर ऐसा स्वर दे सकते थे कि आप अभिभूत होकर सब कुछ भूलकर उनकी आवाज और भाव-भंगिमाओं में ही खो जाएं। हमारे लिए इससे महत्वपूर्ण यह था कि गिर्दा हमेशा अपनी रचनाओं को राजनीति के साथ खड़ा करते और उसे चुनौती देते नजर आते। वह चाहे पफैज के गीत हम ओड़ बारुड़ि ल्वार कुल्ली कभाड़ि द्वारा पूँजीपति के शोषण का एक-एक पाई का हिसाब माँगना हो, चाहे इस शोषित-उत्पीड़ित समाज को बदलकर एक नई दुनियाँ रचने का ख्वाब देखना-हमारी ख्वाहिशों का एक नाम इन्कलाब है, जिसमें आम आदमी के दुःस्वप्नों का अंत हो सके। इसी को आगे बढ़ाकर गिर्दा अपनी रचना में भी जन की दुःख-तकलीपफों को केन्द्रित कर कहते हैं कि-बात मुद्दों की उठाओ तो कोई बात बने। वे जब आमा का चूल्हा जलते देखते हैं तो उसमें भी उनका आम जन हमेशा अपनी पीड़ा के साथ मौजूद रहता है।

आन्दोलनों के क्रम में उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन ‘गिर्दा’ की रचनात्मक सक्रियता का एक महत्वपूर्ण आन्दोलन रहा। उन्होंने आन्दोलन के बीच जो रचा-गाया और विचार दिया, वह उन्हें एक ऐसे व्यक्तित्व के रूप में उभारता है, जिसकी राज्य आन्दोलन के उभार में सबसे बड़ी चिन्ता किसका राज्य और किसके लिए है? वह कह रहे हैं- उत्तराखण्ड की/आज लड़ाई यह जो/ हम लड़ रहे हैं सभी/सीमित हरगिज उत्तराखण्ड तक/इसे नहीं/साथी! समझो/यदि संकुचित हुआ कहीं/ तो भटक लड़ाई जायेगी/इसीलिए/खुले/दिल औ’ दिमाग से/ मित्रो!/लड़ना है इसको। यह स्पष्ट कर देता है कि गिर्दा आन्दोलन के प्रति क्या दिशा और दृष्टि रखते हैं।
(Tribute to Girda)

यह हमारी विडम्बना ही है कि उत्तराखण्ड में बार-बार जन्मे क्रान्तिकारी तेवर के जनान्दोलनों के बाद भी राज्य की जनपक्षीय शक्तियाँ एक साथ खड़ी नहीं रह पाईं। इसका नुकसान यह हुआ कि हमेशा ऐसे आन्दोलनों का हासिल वे ताकतें ले गईं जिनके खिलाफ आन्दोलन रहा। राज्य में तो यह स्पष्ट ही दिखाई दे रहा है कि जिन सपनों/आकांक्षाओं के राज्य के लिए गिर्दा ने रचा/गाया वह अभी हमसे दूर है। लेकिन बावजूद इसके, उन्होंने अपना मोर्चा नहीं छोड़ा।

फिर ऐसा क्यों हो रहा है कि गिर्दा की विदाई पर उन सबके दुःख के साथ वे ही सबसे ज्यादा दुःखी दिखाई दे रहे हैं जिनके खिलाफ गिर्दा जीवन भर लड़ते/रचते रहे। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि कल को गिर्दा के नाम पर किसी पुरस्कार की घोषणा होगी। सरकार के सांस्कृतिक विभाग का कोई आयोजन या फिर सड़क, पुस्तकालय या सभागार का नाम होगा। क्योंकि गिर्दा को अपनाना सरकार की मजबूरी है। वह अपने को विश्वसनीय बनाने के लिए ऐसे तमाम जन-नायकों को कब हमसे छीन लेती हैं, हमें पता ही नहीं चलता। वीरचंद्र सिंह गढ़वाली, नागेन्द्र सकलानी, श्रीदेव सुमन के उदाहरण तो हमारे सामने हैं ही। इसे रोकना तो हमारे बस में नहीं है क्योंकि हमसे ज्यादा जोर-शोर से वे इस बात को कह सकते हैं कि गिर्दा या जन नायकों पर किसी का कापीराइट नहीं है। लेकिन ‘गिर्दा’ और अपने नायकों को वास्तविक जन के साथ जोड़ने और आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी उन तमाम संगठनों/व्यक्तियों की बनती है जो ‘गिर्दा’ के किसी न किसी रूप में सहकर्मी रहे हैं। गिर्दा के सहारे ही सही, हमारे पास फिर  से एक ऐसा मौका है जब हम गिर्दा की रचना और स्वर के सहारे इस राज्य के जनपक्षीय/संस्कृति एवं आंदोलन से जुड़े लोगों को एक साथ लाने की कोशिश करें।
(Tribute to Girda)

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