श्रीमती उमा ढौंढियाल (अनन्त)

उमा अनन्त को हम सबसे विदा लिये हुए आज एक माह बीत गया है। उनकी मित्र डा. सत्या भार्गव ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि देते हुए याद किया है।

तुम न जाने किस जहां में खो गईं।
हम भरी दुनियां में तन्हा हो गये।।

10 अक्टूबर 1988 को जब मैं दरियागंज के स्कूल से स्थानान्तरित होकर आरामबाड़ा स्कूल में पहुंची तब श्रीमती उमा अनन्त ने ही मेरा हंसते हुए स्वागत किया और मुझे प्रधानाचार्या से मिलवाकर मेरे संगीत कक्ष में ले गईं। कक्ष बहुत दिनों से बंद बड़ा या- गंदा था, उसकी सफाई कारवाई और कमरा मुझे सौंप दिया।

उमा जी का स्वभाव बहुत मिलनसार व हंसमुख प्रवृत्ति का था। अपने खाली समय में वे मेरे पास ही आ जातीं थीं। मेरी कक्षा का वातारण मां सरस्वती की बड़ी-सी तस्वीर, सौंधी-सौंधी धूप बत्ती की सुगंध, व मेरे हारमोनियम के स्वरों से हर किसी को आकर्षित करता था। हम दोनों जब भी खाली होते तो कुछ न कुछ साहित्य की बातें, गीत और ग़जल की बातें किया करते थे- वह बहुत अच्छा गातीं थीं। उनसे भी गाना सुनती और सुनाती थी। वह अपनी बातों में बीच-बीच में ऐसे कवित्त और ग़जलों का प्रयोग या अंग्रेजी की कहावतें प्रयोग करती थीं। मैं कहती थी अध्यापिका तो आप इतिहास की हो परन्तु इतनी अच्छी अंग्रेजी व उर्दू व हिन्दी सीख ली जो अपनी वार्ता में भी प्रयोग कर लेती हो। तो उन्होंने बताया मेरे बड़े भाई इन विषयों में मेरी रुचि देख पुस्तकें लाकर देते थे। मेरे भाई  आकाशवाणी में कार्यरत थे- मुझे जो समझ में नहीं आता उसे वहीं रेस्टोरेंट में ही पढ़ा देते थे और इसी प्रकार अन्य भाषाएं भी मुझे आ गईं।

स्कूल के सभी कार्यक्रम वही कराती थीं। कोई संगीत की अध्यापिका नहीं थी, हम दोनों ने मिलकर कार्यक्रम किया। उन्होंने एक कव्वाली सुनवाई जिसके बोल थे,

गंगा को मिटाकर दम लेंगे
ये देश है वीर जवानों का
आजादी के परवानों का
गांधी और जवाहर का
जन्नत-सा बनाकर दम लेंगे।

पता चला कि यह कव्वाली भी उन्होंने ही लिखी और तर्ज भी उन्हीं ने बनाई। मैंने तारीफ करते हुए कहा कि आप तो हरफनमौला हैं। हंसने लगीं और बोलीं, यह सब मेरे भाई की देन है। उर्दू की किताबें, अंग्रेजी की किताबें व हिन्दी की पुस्तकें पढ़कर सब कुछ सीख गई। जहां मुझे समझ नहीं आता था, भाई मुझे वहीं आकाशवाणी के रेस्टोरेंट में ही पढ़ाने बैठ जाते थे। उनके परोपकारों को   मैं कभी भूल नहीं सकती। इसीलिए तीनों भाषाएं मुझे अच्छी तरह आ गईं और वह अपने भाई को याद कर रोने लगतीं। बात-बात पर वह अपने भाई और पिता जी को याद करतीं। उनके पिताजी पंडित नेहरू जी की सिक्योरिटी में सबसे सीनियर थे। पार्लियामेंट में कोई आयोजन होता तो उन्हें भी साथ ले जाते। उस समय उमा जी पार्लियामेंट एस्टेट के स्कूल में कार्यरत थीं इसलिए बड़े-बड़े आफिसरों के, कार्य करने वाले कर्मचारियों के बच्चे ही वहां पढ़ने आते थे। इसलिए बड़े-बड़े नेताओं का भी स्कूल में आना होता रहता था।

मुझे पता था कि मैं छोटी होने के नाते उनके बाद सेवानिवृत्त होऊंगी परन्तु मेरा पहले ही वहां से ट्रांसफर हो गया और मैं उनसे बिछुड़ गई। मैं उनसे कहती रही कि अपना पता देकर बिछुड़ना परन्तु हम बिछुड़ गये। 1991 में मेरा स्थानान्तरण हो गया फिर हम कभी नहीं मिल सके।

तीन वर्ष ही उनके साथ बिताए। सरकारी स्कूल में कौन, कब, कहां चला जाए पता नहीं। 1991 के बाद मैं उनसे मिल नहीं पाई- 1995 में वह सेवानिवृत्त हो गई। मैंने उन्हें बहुत ढूंढा, पता किया और वह मुझे नहीं मिली। मन ही मन उन्हें याद करती, पर न जाने कहां चली गईं।

समय व्यतीत होता गया, यादें भी धुंधली हो गईं। मेरा छोटा बेटा गुरुग्राम में रहता है। वह मेदान्ता अस्पाल में हृदय रोग विशेषज्ञ है। मैं उसके साथ वहां की मार्केट में गई। एक दुकान में मैं घुस रही थी। एक महिला सुन्दर-सी सिल्क की साड़ी पहने बाहर आ रही थी। मुझे उनकी साड़ी बहुत अच्छी लगी, सो मैं साड़ी को घूर रही थी और वह मुझे घूर रही थीं। अपनी आदतानुसार हंसते-हंसते बोली, तुम सत्या भार्गव हो। मैं उन्हें देख चैंक पड़ी और जोर से चिल्लाई ‘‘हाय मिसेज अनन्त।’’ और हम दोनों एक-दूसरे की बाहों में समा गये। हमें होश नहीं, आसपास के लोग हमें घूर रहे थे। बिछड़ने के 24 साल बाद हम मिले थे। उन दिनों दिल्ली में कोरोना का जोर था। कोई किसी से मिल नहीं सकता था और हम दोनों फोन पर ही सुबह-शाम बात करते रहते। घंटों-घंटों वह मुझे समझाती रहतीं, लिखना शुरू करो, बीमारी तो आती ही रहती है। इतनी सकारात्मक सोच थी उनकी। जब फोन करतीं, पूछतीं क्या-क्या लिख लिया, वह अपने संस्मरण लिख रही थीं। मैं भी अपने बचपन के संस्मरण लिख रही थी। फिर कुछ दिन से कह रही थीं, मुझे अपनी कविताएं छपवानी हैं- मैंने कहा, मैंने एक प्रकाशक से बात कर रखी है अपना सब कुछ मुझे भेज दो। मैं महीने भर प्रतिदिन फोन करती, कोई उठाता ही नहीं था। मन में बुरे-बुरे ख्याल आते, और एक दिन बेटे का फोन आया कि मां चली गईं। सुनकर सन्न रह गई। अब हर समय कान में आवाजें आती रहती हैं, जैसे वह कह रही हों, ‘तबियत ठीक है ना ?’ ‘आराम तो नहीं कर रही थीं।’ ‘क्या-क्या लिख लिया ?’ आदि-आदि। यह ही मेरे कान सुनते और गूंज उठते हैं। सोचती हूं केवल तीन वर्ष की साक्ष्य दोस्ती थी जो दिल और दिमाग में छाई हुई थी। अब केवल एक पंक्ति ही कान में गूंजती है।

जाना था हमसे दूर, बहाने बना लिए
अब तुमने कितनी दूर ठिकाने बना लिए।
(tribute to Uma Anant)

डा. सत्या भार्गव, एफ 280, सरस्वती कुंज अपार्टमेंट, दिल्ली-92, 25 आई.पी. विस्तार, दिल्ली